(परमार गुर्जर राजवंश)

गुर्जर जाति के चार प्रसिद्ध राज कुल, प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चैहान थे। गुर्जर प्रतिहार सम्राटों के आधीन सामन्तों में परमार गोत्र के गुर्जर भी थे। आबू चन्द्रावती अवन्ती उज्जैन धारानगरी (मालवा) आदि कई प्रमुख राज्यों क स्थापना परमार गुर्जरों में की थी। आबू के परमार सामन्त और मालवा के परमार सामन्त शुरू में गुर्जर प्रतिहार सम्राटों के बहुत वफादार रहे थे । सन 815 ई0 में गुर्जर प्रतिहार सम्राट नागभट् द्वितीय ने अपनी केन्द्रीय राजधानी उज्जैन से बदलकर कन्नौज बनाई तो उज्जैन का सामन्त उपेन्द्र परमार को अपना सामन्त नियुक्त किया था। परन्तु 10वीं शताब्दी में जब गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य पतन के कगार पर था परमार सामन्तों ने गुर्जर प्रतिहार सम्राटों के पुराने और प्रमुख शत्रु राष्ट्र कूट राजाओं से मेल करके स्वतंत्र हो गए । सियाक परमार ने दसवीं शताब्दी के मध्य राष्ट्रकूटों को भी हराकर अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की थी।परमार भोज परमार वंश के नवें राजा थे। परमार (पवार) वंशीय राजाओं ने मालवा की राजधानी धारानगरी (धार) से आठवीं शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक राज्य किया था। भोज ने बहुत से युद्ध किए और अपनी प्रतिष्ठा स्थापित की जिससे सिद्ध होता है कि उनमें असाधारण योग्यता थी। यद्यपि उनके जीवन का अधिकांश युद्धक्षेत्र में बीता तथापि उनने अपने राज्य की उन्नति में किसी प्रकार की बाधा न उत्पन्न होने दी। 
(1)राजा भोज परमार गुर्जर
        (Gurjar Samrat  Bhoj Parmar )

उसने मालव के नगरों व ग्रामों में बहुत से मंदिर बनवाए, यद्यपि उनमें से अब बहुत कम का पता चलता है। वह स्वयं बहुत विद्वान था और कहा जाता है कि उसने धर्म, खगोल विद्या, कला, कोशरचना, भवननिर्माण, काव्य, औषधशास्त्र आदि विभिन्न विषयों पर पुस्तकें लिखी हैं जो अब भी वर्तमान हैं। इसके समय में कवियों को राज्य से आश्रय मिला था।भोज बहुत बड़े वीर, प्रतापी, पंडित और गुणग्राही थे । इन्होंने अनेक देशों पर विजय प्राप्त की थी और कई विषयों के अनेक ग्रंथों का निर्माण किया था। ये बहुत अच्छे कवि, दार्शनिक और ज्योतिषी थे । सरस्वतीकंठाभरण, शृंगारमंजरी, चंपूरामायण, चारुचर्या, तत्वप्रकाश, व्यवहारसमुच्चय आदि अनेक ग्रंथ इनके लिखे हुए बतलाए जाते हैं। इनकी सभा सदा बड़े बड़े पंडितों से सुशोभित रहती थी । इनकी पत्नी का नाम लीलावती था जो बहुत बड़ी विदुषी थी। इनकी विद्वता के कारण जनमानस में एक कहावत प्रचलित हुई कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तैली
जब भोज जीवित थे तो कहा जाता था-
अद्य धारा सदाधारा सदालम्बा सरस्वती।
पण्डिता मण्डिताः सर्वे भोजराजे भुवि स्थिते॥

(आज जब भोजराज धरती पर स्थित हैं तो धारा नगरी सदाधारा (अच्छे आधार वाली) है; सरस्वती को सदा आलम्ब मिला हुआ है; सभी पंडित आदृत हैं।)

जब उनका देहान्त हुआ तो कहा गया अद्य धारा निराधारा निरालंबा सरस्वती ।
पण्डिताः खण्डिताः: सर्वे भोजराजे दिवं गते ॥

(आज भोजराज के दिवंगत हो जाने से धारा नगरी निराधार हो गयी है ; सरस्वती बिना आलम्ब की हो गयी हैं और सभी पंडित खंडित हैं ।) अर्थात आज धारा नगरी और सरस्वती अनाथ हो गई है इसका सहारा और आश्रयदाता राजा भोज थे जो दिवंगत हो गये हैं इसलिए सारे राज्य के पंडित सरस्वती व धारा नगरी सब यतीम हो गये हैं। 
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